Thursday, March 26, 2020

कैद ज़िंदगी और ये वीराना ...,

किसी को ये कहने की जरूरत नहीं कि ,
आज स्कूल साथ चलते है , ऑफिस से जल्दी निकलेंगे ,
गाड़ी ज़रा देख कर चला, कैसे कैसे लोग है , 
दिन खराब हो गया, ये बाज़ार सबसे सस्ता है, 
कपड़ों का नया स्टॉक आया है, रिक्शे उस चौक से मिलेंगे ,
Ola- Uber बुक कर देता हूं, दोस्त के घर चलते है ,
पार्टी करते है और ना जाने क्या क्या....

या यूं कहो , 
हमें जीना है , तो मिलने की जरूरत नहीं ।
कुछ कहने , करने की जरूरत नहीं ।

ख्याल जैसे भी हो, अब खुद को थाम लेना ।
मन अगर घर से निकलने का हो, तो मन को मार लेना ।।

क्युकिं इन दिनों......
कुछ इन्हीं "हां" और "ना" के बीच , ज़िंदगी तालाश रही है  खुद की ज़िन्दगी । जिसमें उलझी सी है हमारी "सुबह" ,जो हर "शाम" सहम सी जाती है । 
अब तो बचपन में सीखी 100 तक गिनती भी , ना जाने क्यों डराती है । 
बंद पिंजड़े के पंछी भी , बहुत कुछ बोल जाते है ।
और मंजिलों के बीच बीछे ये काले चादर , विरानो में गीड गिड़ाते है ।

यह कैसा , अजीब सा माहौल बना है ,  इर्द गिर्द हमारे  , जहां शोर से ज्यादा खामोशी डराने लगी है ।

आलम यह है इस खामोशी का , कि
गलियों ने खिलखिलाना , सड़कों ने बुलाना और गाड़ियों ने घर जाना छोड़ दिया है । 
बच्चो की हंसी सुकून देती थी जिन्हें , सुना है उन बच्चो ने मुस्कुराना छोड़ दिया है ।
डर और खामोशी से फैले इस वीराने की वजह से, लोगो ने अब, जाना छोड़ दिया है ।
ये कैसी जंग है , कुदरत की इंसान से , जहां इंसान ने इंसान को छोड़ दिया है ।

जहां , शून्य है सब , लेकिन करोड़ों की गिनती अभी बाकी है । 
घूट रहे है सब , सांस लेना अभी बाकी है । 
थक गए है सब , दौड़ना अभी बाकी है ।
यह कैसा इश्क़ है फैला है ,  हमारे दर्मया जहां सब कुछ Alter है ,लेकिन , Confirm करना अभी बाकी है ।

अब तो , घरों में छिपी ज़िंदगी निहारती है खुद को , इन खिड़की दरवाजों से, पर ... इस पसरे पड़े वीराने को देख सहम जाती है ,  बोलती कुछ नहीं इस वीराने से , बस इसके लौट जाने के ख्याल से , खुद को कैद कर,  ये ज़िन्दगी मुस्कुराती और फिर शांत हो जाती है । 











Saturday, March 21, 2020

इश्क़ का हर पन्ना छिपा सा है ......

यूं तो हर फिज़ाओं में हमने इश्क़ को देखा है , कभी हसते , कभी नाचते , कभी अटखेलियां करते देखा है । 
ऐसी अनेक हरकत करते दिख जाता है , यह इश्क़ ।
 जो कभी हंसाता है , गुदगुदाता है , सताता है तो कभी कभी मायूस भी कर जाता है । 
और इस इश्क़ को  , देखना , पाना , और महसूस करना , हम और आप , एक ना एक बार जरूर चाहते है । 
और क्यों ना चाहे , आखिर ये इश्क़ , इतना खूबसूरत जो है । 
अब इस इश्क़ के रूप भी तो बहुत है ..,
 खूबसरत होने के साथ साथ , ये ज़िद्दी भी तो बहुत है , मासूम भी बहुत है , और साथ के साथ हमारे लिए खास भी तो बहुत है । 
ये इश्क़ है जनाब , बीना हम आपके , फैल भी तो नहीं सकता , सुन भी नहीं सकता और बोल भी तो नहीं सकता , ओर तो ओर हर उम्र में होता है , हर शख्स को होता है  ।
ये इश्क़ , छोटा - बड़ा , अमीर - गरीब , गांव - शहर , देश - विदेश , उच - नीच , इच्छा - सम्मान नहीं देखता ।
यह तो हर जगह , हर रंग में चढ़ता है , फूलों की तरह महकता है , हर वक़्त , कोई ना कोई गीत गुनगुनाता है ।
यह इश्क़ है साहब हम और आप को मिलकर रहना और जीना सिखाता है ।
यह इश्क़ वकालत भी खुद करता है , और फैसले भी खुद सुनता है । 

 लेकिन इन दिनों बागो से , वो दिलकश , मन को जीत लेने वाले , हवाओं में ख़ुशबू बिखेरने वाले , खूबसूरत फूल गायब है । जो इस इश्क़ का ख्याल रखते है ।
सुना है , इन फूलों को परेशान करने , दुनिया के हर बाग़ में , एक चोर आया है , जो इन फूलों को इश्क़ करने नहीं देना चाहता , इनको खुलकर महकना और खिलखिलाकर हंसते , देखना नहीं चाहता । 
इसीलिए , बागो के हर  , बागवान ने ,...., 
अपने - अपने बागो के हर फूल को छिपाना और उनपर निगरानी रखनी शुरू कर दी है । ताकि, उस चोर से अपने बाग़ के सभी खूबसरत फूलो को बचा सके , जिसे वह चोर नुकसान पहुंचाना चाहता है । 
क्यूंकि हर बागबान जानता , इन फूलों से फैलने वाले इश्क़ का महत्व , रंगो का महत्त्व , खुशबू का महत्व , और  खुद का इन खूबसरत फूलो के बिना , रहने का महत्व ।
वह जानता है , हर फूलो में शामिल , उसके पत्ते , डाली , मिट्टी और पानी का महत्व ।  
वह बागवान समझता है अपनी बैचैनी में , छिपी हैरानियो का महत्व  । या यूं कहो वह समझता है फिज़ाओं में इश्क़ के , ना होने का महत्व ।
वह सेहमा हुआ सा है ,  लेकिन अपने जिक्र में बेतहाशा फिक्र करता हुआ , नज़र आता है ।  
वह जानता है ........
इन दिनों इश्क़ का हर पन्ना , शांत है । जिस इश्क़ के पन्ने को पढ़कर , सब , सब कुछ बोल दिया करते थे  , आज उनके मुंह पर पट्टी सी लगी है । 
आंखे कहना और हाथ रोकना चाहते है बहुत , आंखो पर पहरा और हाथो पर सख्ती बड़ी है । 
अब यह इश्क़ बोलता नहीं , चलता नहीं , हंसता नहीं  पहले जीतना । शांत अकेले में बैठकर, बस यही चाहता है  कि वह चोर , बागो के फूलो को ना चुराए , ना नुकसान पहुंचाए और हमेशा के लिए उसके बाग को छोड़कर चला जाए । 
क्यूंकि ...,जिस इश्क़ के मनमानियों के शोर थे , फिज़ाओं में , आज वह मान सा गया है। 
उसके खिलखिलाते चहरो ने भी , गंभीरता को समझ , उसकी अंजानी सी सिलवटों को खुदमें समेट सा लिया है । 
जीस इश्क़ के फैसले के बाद सुनवाइयों की जरूरत नहीं हुआ करती थी , आज उस इश्क़ ने अपनी , परछाईं को भी चादर में ओढ़ सा लिया है ।
क्यूंकि ये इश्क़ रहना चाहता है , जीना चाहता है हमेशा... हम और आप में ।
यह जानता है अपने ज़िंदगी का हर वो हसीन लम्हा , जिसके लिए वह छिप रहा है । 
यह आना चाहता है , 
दुबारा खिलखिलाकर हसना चाहता है , 
उस खोफ़ के चादर को जलाकर , जिसने उसे छिपा लिया है खुद में  । 
बस अपने बाग को , जिसकी खूबसूरती उसके हसीन  फूलो से है उसको,  उस चोर से बचना है ।
फिर , यह इश्क़ भी  मुस्कुराते हुए लौट आएगा ।




Monday, February 24, 2020

बस की मनपसंद सीट , और अफसोस

भारत में बस का सफ़र , यकीनन बहोत ही खूबसूरत होता है । अब बात चाहे long journey की हो या फिर शहर गांव के सफ़र की । दोनों ही सूरत में ये सफ़र और भी खबसूरत हो जाती है , जब आपको अपनी मनपसंद  सीट मिल जाती है।
फिर आपको वह सब चीज अचानक ही सुन्दर और अदभुत लगने लगती है , जिसका आपके वास्तविक जीवन से कोई लेना देना नहीं है ।
अब वह फिर चाहे Driver के बजते मनपसंद गाने हो , या फिर कंडक्टर के द्वारा लगाई जाने वाली आवाज़ या फिर उसका शोर । आप सब Enjoy ,कर रहे होते हैं । 
कुछ इसी तने बने में बुनी यह कहानी है l
तो आइए Alter Ishq की ये कहानी पड़ते है , उम्मीद है आपको पसंद आएगी । 

गांव का एक अल्हड़ लड़का , शहर आकर दो साल से काम कर रहा था । के अचानक उसके परिवार में उसके शादी की बात की चर्चा शुरू हो जाती है । और इस वजह से उसको रिश्ते की बात को आगे बढ़ाने के लिए गांव जाना पड़ता है । 

वह इस ख़बर के बाद खुश बहोत था , मानो अपनों से मिलने की उसकी व्याकुलता साफ साफ उसके चहरे पर देखी जा सकती थी ।  
चहरे पर मुस्कान , बातो में बचकानापन और  आंखो में चमक , साफ साफ उसकी इच्छाओं को प्रकाशित कर रही थी । 
उसे शहर से अपने गांव जाना था , सो उसने अपनी टिकट एक बस से करवाई , और अपनी पनपसंद सीट  ( जो हम आप की अक्सर होती हैं )  Window वाली ली और अपनी सीट पर उस दिन समय से पहले पहोच कर अपनी सीट पर बैठ गया । 
उस वक़्त बस की अधिकतर सीटें खाली थी । वह वक़्त से पहले को पहोंच जो गया था ।  धीरे धीरे बाकी पैसेंजर भी आने लगे ।
उसके मन में कल्पनाओं भाव उठने लगा ।  और दिमाग में सौ विचार , उछल कूद करने लगे ।  उसको ये फिक्र सता रही थी कि उसके साथ वाली सीट  पर कौन आएगा । 
के अचानक एक बेहद ही खूबसूरत लड़की उस बस के गेट से अंदर आती है और उस लड़की को देख , लड़के की पलके झुकना भूल जाती हैं । आंखे उसी को निहारने लगतव हैं, और दिल दिमाग बस यही सोच रहा होता है कि... बस वो उसके साथ वाली सीट उसकी हो । 
वह लड़की उसके पास आती है और सीट नंबर कन्फर्म करती है , लेकिन वह 3 4 सीटों का ज़िक्र करती है । तो दिमाग तैनात हो जाता है और उसके आस पास खड़ी उसकी family को भी देखता है । जिसमे उसका  भाई  और माता पिता  भी शामिल थे ।  जिनको उसकी आंखो ने देखने से इंकार सा कर दिया था ।
ख़ैर उनको देख दिमाग इत्मीनान से उनको सीट की डिटेल बताता है और खुद को तसल्ली देते हुए , बस के गेट की तरफ देखने लगता है ।
बस आगे चलने लगती हैं और वह लड़का , खूबसरत वादियों , नदियों , खेतो  , फसलों  और अपनी यादों का लुफ्त लेने लगता है । अपनी विंडो सीट का वह पूरा आनंद ले रहा होता है कि अचानक बस एक स्टॉप पर आकर रुकती है । 
और आंखे फिर उस बस के गेट पर चली जाती है । 
इस बार फिर एक खूबसरत लड़की बस में चढ़ती है और आकर, उस लड़के के आगे वाली सीट पर अंकल जी के साथ बैठ जाती है ।  
उस लड़की को देख,  उस लडके का मन अपने साथ में बैठे बूढ़े पर नाराज़ सिर्फ इसलिए होता है कि उन्हें भी उसी स्टॉप पर उतरना होता है । और वह कंडक्टर को आवाज़ देर से देते है । 
मन एक घने अफसोस के बदलो से गुजर जाता है । 

बूढ़े के उतारने के बाद बस चलती हैं , और वह लड़का  उस लड़की को देखते हुए , अपनी शादी को लेकर , खुशनुमा यादों में खो जाता है । 
क्या होगा, कैसा होगा ऐसे अनगिनत सवालों से उसका दिमाग़ लड़ने लगता है । 
पर मन ही मन वह अपनी सीट से ज्यादा , उस अंकल की सीट को महत्व देने लगता है  जिसके साथ वाली सीट पर वह खूबसरत लड़की बैठी थी । 


Tuesday, February 18, 2020

अनजानी सी गलती ...

हम आपकी जिंदगी में खुशियां का महत्व उतना ही हैं जितना फूलों में, महकती खुशबू का । इसी महकती खुशबू को जीने के लिए हम और आप अक्सर अपनों से हंसी मज़ाक करते हैं , जो हमारे भीतरी मन को गुदगुदाते है और हमारे मुख पर , प्यारी सी मुस्कान छोड़ जाते हैं ।

लेकिन कुछ पल ऐसे है , जो प्यार मोहब्बत और अपनेपन से भरे , इन खुबसूरत लम्हों को उदास कर जाते हैं ! और छोड़ जाते हैं अपनों के चहरे पर वो मायूसी , जो हम-आपको भी सताती है ।

कुछ ऐसी ही कहानी हैं , जहां ये Ishq बहुत चमकदार तो है पर अचानक इस Ishq की चमक धुंधली पड़ जाती हैं । और बनाती हैं Ishq की एक ऐसी कहानी , जो इस खुबसूरत Ishq को Alter बनाती है ।

तो शुरू करते हैं Alter Ishq की इस कहानी को , आशा करते हैं आप पसंद करेंगे ।

फरवरी महीने की बीतती सर्दी के बीच , शादी का ताना-बाना बुना जा रहा था , कहीं बेहतर पकवान बन रहे थे तो कहीं साजो सामान का ख्याल रखा जा रहा था और इसी के साथ-साथ रिश्तेदारों का जमावड़ा भी काफ़ी खुबसूरती से अपने पंख फैला रहा था । 

और ऐसे में,  हंसी मज़ाक से भरी बातों को करते,  बच्चों का एक झुंड , काफ़ी खिलखिला रहा था , जिसको देख , उस घर के बड़े भी अपनी भागीदारी , समय-समय पर दे रहे थे । 
सब बहोत खुश थे और खुब हंस रहे थे ।

माहौल बेहद ही खुशनुमा था , लेकिन उस झुंड में बैठी एक लड़की अचानक मायूस हो जाती है , और अपनी दोनों आंखों को नम कर , वहां से उठ बाहर चली जाती है । 

ऐसे में , पूरा माहौल शांत पड़ जाता है , और सबकी निराश नजरें , उस एक लड़के को निहार रही होती हैं जो कुछ देर पहले तक तो बहोत , बातूनी था , और इस बेहद खूबसूरत पलों का , एक खुबसूरत हिस्सा था ।
पर अब वह बिल्कुल नि:शब्द था । 

इतना शांत था , जैसे बंजर भूमि बिना फसल के दिखाई देती है । उसकी आंखें मानो , मौका तलाश रही थी इस बंजर भूमि को भिगोने का । 
 उसके लब उस लड़की से , अपने को निर्दोष कहना तो बहोत चाहते थे लेकिन उसकी ओर उठी नज़रों ने , उसके लबों , मानो कोई इजाज़त नहीं दी , कुछ भी बलने की।
 
लड़की की भीगी आंखें , उस लड़के के मन को हर वक्त तोड़ रही थी । और उसके चेहरे पर निराशा , के बादल छोड़ रही थी । 
उसे अपनी गलती का एहसास तो था , पर लड़की की आंखों से निकले आसूंओं और अपनो के चहरो पर आई निराशा का , उसको ज्यादा ख्याल था ।

थोड़ा वक्त बीतता है और वह लड़का , घर के द्वार पर बैठ ,  अपनी गलती के बारे में सोचता है ।  कि तभी  उस लड़की का फोन उसके फ़ोन पर आता है , और उसके द्वारा अनजाने की गलती को  , वह लड़की समझ , उसको दोशी नहीं बनाती है । 
उस लड़के के नि:राश मन , थोड़ा शांत होता है । 
और उस लड़की से अपनी बात , खुद के लबों से बोलने के बाद । उसका मन फिर मुस्कुराता है । और घर का 
माहौल फिर से खुशनुमा हो जाता है और सब बेहद खुश नज़र आते हैं। 

पर कहीं न कहीं , कुछ फासले ,अब दूरियों में बदलते नज़र आ रहे थे‌ उसे । 
जिससे उसका मन , अब भी एक सवाल में उलझा रहता है । कि .........
क्या,  वास्तव में उस लड़की ने, उसको माफ़ किया या नहीं ।







Friday, February 7, 2020

मुझे उससे मिलना था ...

वक़्त की करवटों के साथ , कहानियों का संग्रह होना लाज़िमी हैं । कहानियां जिसमें खुबसूरत यादों के , फूलों को पिरो , उसको एक माला का आकार दिया है । 
कुछ ऐसी ही खुबसूरत यादों का , एक सुन्दर सार है यह कहानी ।  जिनमें रोज़ की बातों से ज्यादा , उन नटखट , सुन्दर और आकर्षक पलों को बताया है , जिसमें ये कहानी बसती है , तो आईये शुरू करते हैं , ALTER ISHQ की ये कहानी , आशा है आपको पसंद आएगी .....!!

दुध सी सफेद , गर्मी का वो दिन,  जब वो पहले दफा , हमारे गली में खाली पड़े जमीन को देखने , अपने परिवार संग आई थी ।  और मैं उसी गली में दोस्तों के साथ कंचे खेलता हुआ  , उसको देख , देखते ही रह जाता हूं । 
8- 10 साल की उम्र में यह कैसा आकर्षण था जो बयान नहीं हो रहा था ।  जुबां तो कुछ कह नहीं रही थी , और आंखें किसी और से बोलना नहीं चाहती थी ।
 खैर जमीन का वो खाली हिस्सा उसकी Family खरिद लेती है । पर अपना घर,  वो 10-12  साल बाद उस खाली,  खरिदी जमीन पर बनवाते हैं । इंतजार के 10-12 साल बाद वो एक बार फिर से , मुझे दिखाई देती है ।
इस बार भी उसको देख , वहीं रुक जाने का दिल किया । इन ढूंढ़ती आंखों को बहोत बातें करनी थी उससे और लबों को तो मानो इन्कार कर दिया था कुछ कहने से ।
लेकिन उम्र के इस पड़ाव में , पैरों को चाहकर भी रोक ना सका , बदनाम ना हो जाऊं कहीं इन आंखों की मनमानियों से , इसलिए खुद को बहोत जल्दी रूकसद करना पड़ा ।  
माना एक अरसा गुज़ारा है इन आंखों ने खामोशियों में , पर बात भी तो ,अपनी गली की थी । 
फिर भी दिल ना जाने क्यों बहोत खुश था । शायद वो समझ बैठा था,  कि घर तो अब बनवा लिया है, तो कभी ना कभी मुलाकात तो होगी । और दिल को शायद इस बात की काफ़ी खुशी थी , कि 10 - 12 साल बाद ही सही , अब वो इन आंखों के पास तो रहेगी । 
लेकिन वह घर उन्होंने बनवाकर , किरदार को किराए पर दे दिया । 
और करीब 5-6  साल बाद,  उसका पूरा परिवार,  अपने घर में रहने के लिए आए ।
पर इस बार परिवार में सब तो दिख रहे थे , पर मन जिसको देख कर मिलना चाहता था , वो नहीं दिख रहा था । आंखें मानो बेचैन सी हो गई थी । लबों को इशारा तो बहुत किया , केहने को । लेकिन घबराईए आंखों से कुछ बोला नहीं जा रहा था ।
काफ़ी समय बाद लबों ने , हरकत दिखाई , तो उसकी शादी की बात सामने आई ।

उस दिन मैंने खुद से बेहद बातें की , खुद की गलतियां खोजी । 
आंखों को आईने के पास लेजाकर , उन आंखों से खुद को कई बार देखा । पर कुछ ख़ास जवाब , खुद से मिला नहीं ।
खैर यूं तो , 
मिलकर उससे , मुझे बहुत कुछ कैहना था ।
बीते इस लम्बे इन्तज़ार को , 
उसके चुनर में जड़ें , उस मोती सा छोटा करना था ।
हां , मुझे उससे मिलना था ....!!

Saturday, December 14, 2019

एक दोस्ती ऐसी भी,,,

" दोस्त " एक शब्द है , जिंदगी में आने वाले पहले अंगड़ाई का । जिसके साथ से,  ये जिंदगी सुलझने लगती है । और इस जिंदगी में मिठास घोलने लगती है। 
लेकिन कुछ जगह ये दोस्ती उलझ सी जाती है, और कड़वा सी कर देती हैं , इस जिंदगी को।
कुछ ऐसी ही कहानी है इस Alter Ishq की , जहां उलझी उलझी सी है दोस्ती , और उलझे उलझे हैं वो सब ।
तो आइए पढ़ते हैं , "एक दोस्ती ऐसी भी " ।
एक शहर , जिससे दूर एक कस्बा बस्ता है , जिसमें कुछ जिंदगियां ,खुद से जीने का , संघर्ष कर रही हैं । 

इन्हीं जिंदगी में से दो जिंदगी निकल आती है , इस शहर मे , जहां लोगों के बीच दूरियां बहुत है , लेकिन फिर भी सब मिलकर रहने की कोशिश करते हैं ।
हां इसी शहर में ,जहां ये शहर बोलता तो नहीं पर कभी कभी चिखता ज़रुर है । 

तो इस शहर में , यश और मानसी भी अपनी अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने आते हैं । क्योंकि वो मानते थे कि शहर हमारे कस्बे से काफ़ी बेहतर और खुबसूरत है , शहर में सब से रहते हैं , अच्छा पढ़ते हैं, बड़ी बड़ी गाड़ी में सवारी करते हैं , और अच्छे पैसे कमाते हैं , ऐसे ना जाने कितने उम्मीदों को लेकर , वो दोनों भी शहर आये थे ।
यश का स्वभाव अच्छा था और पढ़ाई भी अच्छी की थी तो यश को नौकरी जल्दी मिल जाती है , लेकिन मानसी यश के विपरित थी । इसलिए शहर में मानसी को सफलता नहीं मिल पा रही थी। लेकिन यश ने मानसी का साथ नहीं छोड़ा था और उसको अपने घर में रहने के साथ-साथ , उसकी मदद भी करता था । 
वक्त के साथ साथ , मानसी और यश एक दूसरे के बहोत अच्छे दोस्त बन गए थे और एक दूसरे से अपनी सारी बात करते थे ।
एक दिन मानसी बेहद निराश बेठी थी और खुद से बेहद परेशान भी थी ।  तो यश केहता है , देख मानसी अब ना तो तेरे पास पैसे बचे हैं और ना ही तुझको तेरे मुताबिक कोई काम मिला है ।  अगर तु , बोले तो मैं अपने Office में बात करूं , अब तो मुझे भी काफ़ी वक्त हो गया है और उनको नये Staff  की भी जरूरत है । मानसी को नौकरी में कोई दिलचस्पी नहीं थी , लेकिन हालात बिगड़ते देख उसने नौकरी के लिए मनाया खुद को , और यश के साथ नौकरी करने लगी , और धिरे धिरे यश को पसंद करने लगी थी लेकिन यश इन सबसे अनजान था । और इधर यश भी किसी को चाहने लगा था और वो भी उसी Office  में थी पर वो मानसी नहीं थी। 
मानसी को यश का किसी के पास जाना , उसके पास किसी भी लड़की का आना , अब पसंद नहीं आ रहा था । मानसी यश को लेकर बहोत गम्भीर हो गयी थी । 
और यश अभी अनजान था मानसी की गम्भीरता को लेकर जो कि अब एक सनक बन चुकी थी शायद । 
एक दिन यश ने अपनी बात मानसी से बताई , कि वो और सपना एक दूसरे को पसंद करते हैं और हमने एक दूसरे के परिवार से भी बात कर ली है , जल्द ही हम दोनों एक हो जाएंगे , पिता जी भी जल्दी शहर आ रहे हैं । 
मानसी को ,  ये बातें सुनकर गुस्सा आ जाता है और वो अपने कमरे में चली जाती है , और अपने सपनों को फिर से टुटता देख , वो एक ग़लत फैसला कर जाती है । 
और रात के खाने में ज़हर मिलाती है । 
यश खाना खाने के बाद हमेशा के लिए शांत हो जाता है और मानसी उस शांत पड़े यश पर , देर रात तक , चिखती है - चिल्लाती है और अंत में खाने का बचा हिस्सा , वो भी खाकर , हमेशा के लिए सो जाती है ।

उस रात भी यह शहर चीखा और देर सुबह तक इसका शोर शहर के हर हिस्से में बना रहा और फिर ये शहर शांत हो गया ।











Monday, December 2, 2019

हां मैं लड़की हूं ....

मेरे , घर में आने पर , 
आज भी कुछ आंखों में खुशी नहीं आती हैं 
और चेहरे पर ऐसे भाव दिखाई देते है, मानो 
कोई समझौता सा किया हो ख़ुद से ।
समस्याओं कि एक ऐसी पहेली में फस जाते ये सब, जिसका जवाब मैं , हर वक्त , हर जगह , और हर शब्द में देती हूं । 
जिन्दगी को छिनना और इस छिनी गई जिंदगी को , जीकर बताना , ऐसी ज़िद्द मैं बरसों से करती आई हूं ।
मैं लड़ती हूं , बीखरती हूं , टूटतीं और संवरती भी हूं 
पर हार जाने से , मैं आज भी बहुत डरती हूं ।
हां मैं लड़की हूं , जो हर वक्त बदलती आई हूं। 

लेकिन आज मेरी लड़ाई ओर अधिक बढ़ गई है । शायद मेरी ज़िद्द ने मुझे , बहोत ताक़तवर बना दिया है ।
क्योंकि किसी एक की औकात नहीं , जो मुझसे जीत सके , सब झुंड में ही आते हैं, और वो भी तीर कमान लिए ।
और नहीं होती हिम्मत जो मेरे मुंह पर बोल सके , सहम जाते हैं सब , अपनी छोटी बात लिए ।

पर मुझे अभी और शक्तिशाली बनना है , कि
झूक जाए वो नज़रें , जो मुझे हर तरफ घूरती है , 
खत्म हो जाऐ वो वहशीपन, 
जो मुझे घूरते वक्त , उनकी सोच बनती हैं ।
यूं तो हर उम्र में लड़ती आई हूं और लड रही हूं ।
लेकिन फिर भी पुछ बेठती खुद से ‌, कि

किस उम्र में खेलूं कूदू , या पढू क़िताबें खोल के , 
बाबूल के आंगन में ही डसते , कितने काले लोग रे। 

ऐसी बहुत सी कहानी है मेरी , जिनमें मैं कमजोर लगती हूं । मुझे लड़ना है और अपने हर सवाल का जवाब जानना है , जैसे कि,,
चौदह दिन का छोटा पौधा, क्यों तुने खिलवाड़ किया ।
दो महीने सींचा फिर से, क्यों टेहनी पर वार किया ।
चार साल तक बचती आई ,क्यों पत्ता पत्ता तोड़ लिया।
सात साल में लड़कर मर गई, क्यों बारह में उखाड़ दिया।
१३, १५, १७, २६ हर उम्र में , क्यों विनाश किया ।
कैसी है हैवानियत तुझमें , कि
मरने के बाद भी, मेरा शिकार किया ।
लेकिन, 
एक दिन वो भी आएगा जब मैं , इन सब सवालों का जवाब लूंगी और तेरी हैवानियत खड़ी जल जाएगी ।

तब मैं किसी से मदद नहीं मांगूंगी , मोमबत्ती नहीं जलवांउगी , शोर नहीं मचवांउगी बल्कि  
मैं भी तुझे  जिंदा वहीं जलाऊंगी और बेपनाह चिल्लाऊंगी ताकि तेरी चिख़ भी ना सुन ले कोई , 
मैं ऐसा तांडव मचाऊंगी ।

मत भूलो मैं वो लड़की हूं 
जिसने बंद दरवाजों से हवाओं का सफर किया है ।
तुम्ही को पाल , तुमको कांधे तक किया है ।
मैंने नदियों से , समंदर का रास्ता तय किया है ।
और सबसे जरुरी बात, तुमको पैदा तक किया है ।

अगर जाग गई हैवानियत मुझमें( लड़की )
तो क्या तुम कर पाओगे , 
पैदा होना तो दूर , पनप तक ना पाओगे ।

हां मैं लड़की हूं ।